बाबा की पोटली किसी जमाने में यात्रा पर निकलने वालों के लिए अति अनिवार्य वस्तु थी । और आज हममें से बहुत से किशोर शायद पोटली का सही अर्थ भी नहीं जानते । मैंने सुबह सुबह अपने पापा को बालकनी में खडे़ होकर किसी से कहते सुना, अरे भाई पोटली लेकर आफिस जा रहे हो ! कुछ अटपटा लगा तो बाहर आकर देखा । एक कपड़े में बांधकर कुछ सामान सा बाइक पर रखा था।
५ जून को पृथ्वी दिवस मनाया गया था । पालीथीन बैग के व अन्य प्लास्टिक पदार्थों के प्रयोग पर कई राज्य सरकारें रोक लगाकर हटा भी चुकी हैं । ऐसे में पोटली शब्द में मुझे काफी समाधान या पर्यावरण सुरक्षा का भाव दिग्दर्शित हुआ । पिछले कुछ दशकों तक भारत के आम जन में पोलीथीन या प्लास्टिक रैपर का कोई नामों निशान तक न था, खाने पीने का सामान हो, कपडे हों या कोई भी अन्य सामान कपडे़ के घर में ही बनाए बड़े बडे़ थैलों या चादर आदि में बांधकर हम कहीं भी ले जाते हुए संकोच नहीं करते थे । लेकिन कब पोटली और थैले का स्थानापन्न पोलीथीन के बडे छोटे रूपों ने कर दिया हममें से अक्सर ने ध्यान ही नहीं दिया । और कब ये पोलीथीन हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा व आर्थिक हालत का आइना सा बन गए हम समझ भी न पाए । यदि मंहगी दुकान का पालीथीन हाथ में हो तो हमारी हैसियत बढ़ सी जाती है । यदि गरीब हुए तो वही आवाज करने वाला पालीथीन हाथ में होगा, और घर का बना थैला तो शायद सबसे ज्यादा गरीब होने का पर्याय माना जाता है। अब तो हालत यह है कि पर्यावरण, धरती और अपने जीवन पर मंडराते भारी खतरे को चीहन्ते हुए भी हम हैसियत के इस डुगडुगे से अपना पिंड नहीं छुड़ा पा रहे , घर से कपड़े का थैला न लेकर चलने की जो आदत बिगड़ चुकी है उसे सुधार नहीं पा रहे । हम जिस तरह थैले या पोटली की जगह मंहगी दुकान को हाथ में लेकर चलते अपने को अधिक शोभनीय पाते हैं वैसे ही छोटे छोटे बच्चे घर के ताजे नुकसान रहित भोजन की अपेक्षा रैपर में पैकड् चिप्स व अन्य खाद्य पदार्थों को अधिक पसंद करते हैं जो उनकी सेहत और पर्यावरण दोनों को भयंकर नुकसान पहुंचा रहे हैं । हमें जितना हो सके उतना सहज प्रकृति प्रदत्त चीजों का ही प्रयोग करना चाहिए । यह संस्कार हम किशोरों से ही छोटे बच्चों को मिलेगा जो प्रौढों की जगह किशोरों और युवा लोगों से अधिक सीख लेते हैं । तो अगली बार घर से बाजार के लिए निकलते
हुए थैला लेते हुए शरमाइएगा नहीं । यह आपकी पर्यावरण संवेदनशीलता का भी प्रमाण है